कुनबे को बचाने में अ ‘सफल’ कांग्रेस, जनता के साथ विश्वासघात

11 अगस्त 2020। प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस में जारी महीनेभर की उथल-पुथल का काला अध्याय समाप्त तो हो चुका है लेकिन इसे इतिहास के उस पन्ने में दर्ज किया जाएगा जिसे भावी पीढ़ियां पढेंगी तो उन्हें पता चलेगा कि कांग्रेस पार्टी के अंतर्कलह का खामियाजा आमजन को किस प्रकार उठाना पड़ा था। सियासी पॉलिटिकल ड्रामे का खत्म होना प्रदेश के 8 करोड़ जनता के लिए सुकून की बात है क्योंकि कांग्रेस के इस ड्रामे में जनता पीस रही थी। इस पूरे ‘पॉलिटिकल ड्रामे’ का पटाक्षेप जिस प्रकार हुआ है वो सुनियोजित था। कहते हैं प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, मैंने पूर्व में भी कहा था कि प्रदेश में सरकार बनने के समय से ही दो खेमों में बंटी हुई कांग्रेस पार्टी के इस हाई-प्रोफाइल ड्रामे की पटकथा खुद सरकार ने लिखी, जिसके सारे किरदार भी मुख्यमंत्री व उप-मुख्यमंत्री सहित सरकार के तमाम मंत्रीगण व विधायकगण रहे और नायक भी यही रहे और खलनायक भी।

सत्ता की कुर्सी हासिल करने के लिए विगत महीने भर से जारी कांग्रेस की आपसी खींचतान व अंतर्कलह खुलकर सामने आई, गहलोत गुट व पायलट गुट में आरोप-प्रत्यारोप के तीखे व पीड़ादायक शब्दभेदी बाण चले जिसका नुकसान आखिरकर आम जनता को ही उठाना पड़ा है। सरकार ने जनता की समस्याओं को किनारा कर खुद को बाड़ेबंदी में कैद रखा और जयपुर व जैसलमेर के पांच सितारा होटल से जो तस्वीरें व वीडियो कांग्रेस विधायकों के जारी हुए वो दर्शाते हैं कि जनता की गाढ़ी कमाई को किस तरह से इन पर लुटाए गए हैं। दोनों गुटों के विधायक 1 महीने से पांच सितारा होटल में कैद रहे जिन पर खर्च हुए करोड़ों रुपये का हिसाब देने वाला भी कोई नहीं है।

कांग्रेस पार्टी की कलह सड़कों पर आने से बच सकती थी जो विवाद 3 घंटे में सुलझा है वो महीनेभर पहले भी सुलझ सकता था। संगठन के तौर पर कांग्रेस में बिखराव आ चुका है और जो दूरियां है वो अब मिटाए भी नहीं मिट सकेगी। भले ही दोनों खेमों में रज़ामंदी हो गई है लेकिन राजस्थान की आम-आवाम इसके लिए रजामंद नहीं है। कांग्रेस आलाकमान अगर पहले ही गंभीर व सावचेत हो जाता तो प्रदेश की जनता के साथ महीनेभर से जो विश्वासघात किया जा रहा है, समय बर्बाद किया गया वो नहीं होता। आलाकमान ने मुख्यमंत्री व पूर्व उप मुख्यमंत्री के रिश्तों में भले ही मजबूरी व दबाव में गांठ बांध दी गई हो लेकिन वो फिर से कब खुल जाए उसका पता नहीं है। इनमें मतभेद तो है ही लेकिन अभी तक मनभेद भी दूर नहीं हुए हैं।

किला जब ढह जाता है और बाहर से उसकी बुर्ज की मरम्मत कोई अगर कर ले तो ये नहीं माना जाएगा कि किला अंदर से सुरक्षित है। जिस सरकार का जन्म ही अंतर्विरोध से हुआ है उसका लंबे समय तक बने रहना बेहद मुश्किल लगता है। अभी तूफान से पहले की खामोशी है, फिर प्रचंड तूफान कब आएगा, फिर ये सरकार टुकडों-टुकड़ों में कब बिखरेगी, ये समय का इंतजार है, समय देखिए और समय की रफ्तार देखिए। क्योंकि ये सब राजस्थान की जनता ने भुगता है जो कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। समय आने पर प्रदेश की जनता कांग्रेस के इस पॉलिटिकल ड्रामे का माकूल जवाब देगी।

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